डीएनए हो सकती है भारत के स्वास्थ्य की चाबी

‘जीन कुंडली खोलेगी ज़िंदगी के राज’ – जनसत्ता में प्रकाशित इस लेख में दावा किया गया है की डीएनए संरचना विधेयक के कानून बनते ही देश में जीन कुंडली बनाने का रास्ता साफ़ हो जाएगा| लेकिन यह निष्कर्ष ठीक नहीं है| डीएनए विधेयक कानून से स्थापित होने वाला डेटाबेस और जीन संशोधन के लिये स्थापित किया जाने वाला डेटाबेस, यह दोनों अलग-अलग उपक्रम है| इस अंतर को समझना बेहद ज़रूरी है एक स्वस्थ भारत के निर्माण हेतु|

हमारी कोशिकाओं मैं निवासी “डीएनए” (डीऑक्सीराइबो नुक्लेइक एसिड) हमारे जीवन के वास्तुकार है। यह डीएनए ज्ञान का एक बड़ा पिटारा है । आज भी डीएनए से क्या-क्या जानकारी प्राप्त की जा सकती है इसकी खोज चल ही रही है। डीएनए में दो प्रकार की श्रृंखलाएं होती है – जीन, जो हर व्यक्ति की शारीरिक और व्यावहारिक विशेषताओं का नियंत्रण करती है और नॉन-कॉडिंग डीएनए जिसका काम अभी हमे पूरे तरीक़े से पता नहीं है। 

जीन यह एक ऐसा कोड है, जो अपने अंदर जीवन के रहस्य समाए हुए है। आज की तारीख में कौन सी जीन किस विशेषता का नियंत्रण करती है इसका शोध बड़ी तेज़ी से चल रहा  है| उदाहरण के लिए हमें अब पता चला है कि ख़ून में पाए जाने वाला हैमोग्लोबिन तीन अलग-अलग जीन के नियंत्रण में है| 

नाना प्रकार के जीन खुद से या दूसरी जीन के साथ मिलकर हमारी अलग-अलग विशेषताओं को रूप देते है| क्योंकि डीएनए ही हमारा वास्तुकार है और जुड़वाँ लोगों को छोड़कर कोई दो इंसान एक जैसे नहीं होते, हर इंसान के डीएनए की संरचना भी  निराली होती है| इसीलिए डीएनए का उपयोग इंसान की पहचान करने के लिए भी किया जा सकता है| पितृत्व जांच का ही मसला देखिये – क्योंकि हमारा डीएनए हमारे माता-पिता से आते है, बच्चे के डीएनए की संरचना माता और पिता के डीएनए से मेल खाती है| इसलिए तीनों के डीएनए की तुलना करके, बच्चे का पिता कौन है यह निर्धारित किया जा सकता है| हम अक्सर कहते है की बच्चा अपनी माँ या बाप पे गया है, डीएनए ही है इसका सच्चा रचनात्मक| इसी तरह अगर माता या पिता के डीएनए में कोई दोष है, जो बच्चे के भी डीएनए में आया है, तो बच्चे को भी बीमारी होने की संभावना है| 

डीएनए से पहचान और स्वास्थ्य इन दो चीजों का खुलासा हो सकता है| पर इन दो अनु प्रयोगों के तकनीकी और सामाजिक मसले अलग अलग है| इसीलिए डीएनए से प्राप्त हुई जानकारी को दो अलग पहलू से देखना जरूरी है|  

इंसान की पहचान की बात करें तो, डीएनए फिंगरप्रिंटिंग, यह टेक्नोलॉजी नॉन-कोडिंग डीएनए की जांच करके पहचान निर्धारित करती है| यह नॉन-कोडिंग डीएनए की संरचना हर इंसान में अलग होती है|  इस संरचना की जाँच से स्वस्थ्य की जानकारी प्राप्त नहीं हो सकती| इस तकनीक का उपयोग पितृत्व निर्धारता के साथ शव की पहचान में भी हो सकता है|  

डीएनए के पाए जाने पर संदिग्ध व्यक्ति के अपराध स्थल पर होने का प्रमाण मिल सकता है | अपराध स्थल पर मिले डीएनए को डीएनए संरचना विधेयक कानून के तहत बने लाखों डीएनए प्रोफाइल के डेटाबेस में ढूँढा जाएगा| इससे बार-बार अपराध करने वाले व्यक्ति पकड़े जा सकते है| सगे-संबंधी के डीएनए की तुलना करके लाशों की भी पहचान संभव हो पाएगी| पर यह डीएनए का इस्तेमाल स्वास्थ्य परियोजना से अलग है| 

स्वास्थ्य जानकारी के लिए जीन का विश्लेषण किया जाता है| इंडिजन प्रोजेक्ट की तहत वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद १०,००० भारतीय नागरिकों के जीन का अभ्यास कर रहे है| इससे यह पता चलेगा की भारतीय आबादी में कौन से आनुवंशिक रोग प्रचलित है और उनके आधार-भूत कारण क्या है| पुरे डीएनए विश्लेषण की कीमत १ लाख रुपये है, प्रति बीमारी की जाँच तक़रीबन ५००० रुपये में हो सकती है| इंडिजन प्रोजेक्ट से पायी गयी जानकारी कौन सी बिमारियों की जोखिम भारतीय आबादी को ज्यादा है यह दर्शाएगी| इस पर निर्भर लोग खुद के डीएनए की जांच कम कीमत में चुनिंदा बिमारियों के लिए कर सकते है| अगर अनुवांशिक दोष मिलता है तो वे लोग अपने स्वास्थ्य के लिए सूचित निर्णय ले सकते है| उदाहरण के लिए अगर किसी महिला को ब्रैस्ट कैंसर की संभावना बढ़ा ने वाला दोष है, तो वह महिला ज्यादा बार ब्रैस्ट स्क्रीनिंग करवा सकती है| इससे अगर कैंसर होता है तो वह जल्दी पता चल कर उसपर इलाज हो पाए| दूसरा उदाहरण है थैलासीमिया का – यह रोग हैमोग्लोबिन के जीन में ख़राबी के वजह से होता है| अगर माता और पिता दोनो से ख़राब जीन बच्चे में आजाए तो बच्चे को यह बीमारी हो सकती है|  अगर माता और पिता को पहले से ही पता हो कि उनमें यह दोष है तो बच्चे को जन्म देने से पहले परमार्श कर सकते है| इससे पीड़ित बच्चे का जन्म रोका जा सकता है| इसके अतिरिक्त यह जानकारी का लाभ उठाकर अनुवांशिक दोषों पर अनुरूप दवाईयां बनाई जा सकती है| इसीलिए यह इंडिजन परियोजना में केवल १०,००० नागरिक नहीं, पर १०,००,००० नागरिक के डीएनए का विश्लेषण करना चाहिए|  

तो डीएनए का यह उपयोग उसके फॉरेंसिक उपयोग से अलग है| इंडिजन प्रोजेक्ट और डीएनए संरचना विधेयक कानून के प्रयोजन अलग है| इंडिजन परियोजना के भीतर जो डीएनए संगृहीत किया जा रहा है वह डीएनए देने वाले लोगों के सहमति के साथ किया जा रहा है|  इससे जो डेटाबेस बनेगा उसका उपयोग लोगों की पहचान करने में नहीं होगा| डीएनए संरचना विधेयक के तहत जो डेटाबेस बनेगा उसमे अपराधी का डीएनए जायेगा, जिसके लिए उनकी सहमति की जरूरत नहीं है| संदिग्ध और विचाराधीन अपराधी का डीएनए सहमति के साथ लिया जायेगा और निर्दोष पाए जाने पर वे अपना डीएनए डेटाबेस से निकलने के लिए अर्जी दे सकते है| यह कानून इंडिजन या किसी भी नागरिक डीएनए डेटाबेस का नियंत्रण नहीं करता|

यह कानून जीन कुंडली बनाने का रास्ता साफ़ नहीं करता, परन्तु यह कानून फॉरेंसिक उद्देश्य से बनने वाले डेटाबेस का दुरुपयोग ना हो यह देखने में बहुत ही महत्पूर्ण है| लोगों से गुज़ारिश है की यह दो उपयोग में अंतर समझे  और डीएनए के विविध उपयोग की जानकारी ठीक से कर लें| इंडिजन प्रोजेक्ट में योगदान करने से मत हिचकिचाएँ  – आपका डीएनए आपके खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जायेगा| अगर यह ख़ौफ़ बन जाये तो यह प्रोजेक्ट असफल हो जायेगा और भारतीय नागरिक स्वास्थ्य सम्मुनति का एक शानदार अवसर खो बैठेंगे|